महात्मा गांधी जी के 11 सर्वश्रेष्ठ प्रेरक प्रसंग prerak prasng of Mahtma Gandhi

महात्मा गांधी जी के 11 सर्वश्रेष्ठ प्रेरक प्रसंग

prerak prasng of Mahtma Gandhi

प्रेरक प्रसंग 1:-बाल-प्रेम
महात्मा गांधी बच्चों से बेहद प्यार करते थे। वे उन्हें पत्र लिखा करते थे। एक बार उन्हें एक बैठक में जाना था। सभी नेता पहुँच चुके थे, लेकिन गाँधी जी नही आए। नेता चिंतित हो उठे। गाँधी जी तो समय के पक्के है- क्यों नही आए, कहीं बीमार तो नही पड़ गए। कुछ लोग दौड़ते हुए गांधीजी के पास पहुँचे। देखते हैं कि वे एक पुराने बक्से में हाथ डाले कुछ खोज रहे हैं।
एक नेता ने कहा:- बापू! हम तो घबरा गए थे, लेकिन आप यहाँ अभी क्या कर रहे हैं?
गाँधी जी ने कहा:- अभी कुछ दिन पूर्व दक्षिण भारत के एक अछूत बच्चे ने बडे़ प्रेम से मुझे अपनी पेन्सिल दी थी, वही खोज रहा हु, उसी से आज लिखूँगा।
नेता चकित हो गए।
प्रेरक प्रसंग 2:- सत्य का पालन
महात्मा गांधी के बाल्य जीवन की एक घटना है।कक्षा में स्कूल इंस्पेक्टर जाँच के लिए आए। शिक्षक अंग्रेजी पढा़ रहे थे। इंस्पेक्टर सभी छात्रों से एक-एक कर पूछते हैं।
गाँधी जी से उन्होंने ‘केटल’ शब्द का हिंदी लिखने को कहा।
शिक्षक इशारा कर रहे थे, लेकिन गाँधी जी ने कुछ भी ध्यान नही दिया। गाँधी जी को शिक्षक के इशारे पर लिखना असत्य का आचरण लगा। उन्हें जो आता था वही लिख दिया, जो गलत था।
इंस्पेक्टर के जाने के बाद शिक्षक ने उन्हें डॉट लगाई, लेकिन उन्हें कोई फर्क नही पडा़ । गाँधी जी को शिक्षक का झूठा व्यवहार अच्छा नही लगा।
प्रेरक प्रसंग 3:- कभी झूठ मत बोलो।
गाँधी जी के बडे़ भाई कर्ज में फंस गए थे। अपने भाई को कर्ज से मुक्त कराने के लिए गाँधी जी ने अपना सोने का कडा़ बेंच दिया और उसके पैसे अपने भाई को दे दिए।
मार खाने के डर से गाँधी जी ने अपने माता पिता से झूठ बोला कि कडा़ कही गिर गया है। किंतु झूठ बोलने के कारण गाँधी जी का मन स्थिर नही हो पा रहा था। उन्हें अपनी गलती का अहसास हो रहा था और उनकी आत्मा उन्हें बार-बार यह बोल रही थी कि झूठ नही बोलना चाहिए।
गाँधी जी ने अपराध स्वीकार किया और उन्होंने सारी बात एक कागज में लिखकर पिताजी को बता दी। गाँधी जी ने सोचा कि जब पिता जी को मेरे इस अपराध की जानकारी होगी तो वह उन्हें बहुत पिटेंगे। लेकिन पिता ने ऐसा कुछ भी नहीं किया। वह बैठ गए और उनके आँखों में आंसू आ गए।
गाँधी जी को इस बात से बहुत चोट लगी। उन्होंने महसूस किया कि प्यार हिंसा से ज्यादा असरदार दंड दे सकता है।
प्रेरक प्रसंग4:- मांस को त्यागो और हिंसा मत करो।
गाँधी जी ने अपने जीवन में कभी भी मांस को हाथ नहीं लगाया। किन्तु एक बार उन्होंने मांस का सेवन किया था। जब गाँधी जी ने मांस खा लिया उस रात को गांधी जी को पूरी रात अपने पेट में बकरे की बोलने की आवाज महसूस हुई। तब से गाँधी जी ने अपने पूरे जीवन में कभी भी मांस को हाथ तक नही लगाया और अहिंसा का पालन करने की ठान ली।
प्रेरक प्रसंग 5:- गलती की है तो माफी मांगे।
गाँधी जी एक बार अपनी यात्रा पर निकले थे। तब उनके साथ उनके एक अनुयायी आनंद स्वामी भी थे। यात्रा के दौरान आनंद स्वामी की किसी बात को लेकर एक व्यक्ति से बहस हो गयी और जब यह बहस बढी तो आनंद स्वामी ने गुस्से में उस व्यक्ति को एक थप्पड़ मार दिया।
जब गाँधी जी को इस बात का पता चला तो उन्हें आनंद जी की यह बात बहुत बुरी लगी। उन्हें आनंद जी का एक आम आदमी को थप्पड़ मारना अच्छा नही लगा।इसलिए उन्होंने आनंद जी को बोला की वह उस आदमी से माफी मांगे। गाँधी जी ने उनको बताया कि अगर यह आम आदमी बराबरी का होता तो क्या आप तब भी इन्हें थप्पड़ मार देते।
गाँधी जी की बात सुनकर आनंद स्वामी को अपनी गलती का अहसास हुआ। उन्होंने उस आम आदमी से इस बात को लेकर माफी मांगी।
प्रेरक प्रसंग 6:- छूत-अछूत को त्याग दो।
यह बात उन दिनों की है जब महात्मा गांधी जी के पिता जी का तबादला पोरबंदर से राजकोट हो गया था। जहाँ गाँधी जी रहते थे वही उनके पड़ॊस में एक सफाईकर्मी भी रहता था।
गाँधी जी उसे बहुत पसंद करते थे। एक बार किसी समारोह के मौके पर गांधी जी को मिठाई बाँटने का काम सौंपा गया। गाँधी जी सबसे पहले मिठाई पड़ॊस में रहने वाले सफाईकर्मी को देने लगे।
जैसे ही गाँधी जी ने उसे मिठाई दी वह गाँधी जी से दूर हटते हुए बोला कि:- मैं अछूत हूं इसलिए मुझे मत छुएं।
गाँधी जी को यह बात बुरी लगी और उन्होंने इस सफाई वाले का हाथ पकड़कर मिठाई पकडा़ दी और उससे बोले कि:- हम सब इंसान हैं, छूत-अछूत कुछ भी नहीं होता।
गाँधी जी की बात सुनकर सफाईकर्मी के आंसू निकल गए।

प्रेरक प्रसंग 7:- पहले अच्छा जीना सीखो और तब दूसरों को सिखाओ।
एक महिला अपने बच्चे के साथ गाँधी जी के पास शिकायत लेकर आई कि मेरे बच्चे को समझाइए, यह मीठा ज्यादा खाता है।
गाँधी जी ने कहा:- ठीक है, तुम तीन दिन बाद इसे लेकर आना।
महिला निर्धारित दिन फिर आई, तो गाँधी जी ने उस बच्चे को मीठा कम खाने और छोड़ने की सलाह दी।
इस पर महिला ने कहा:- यह तो आप पहले भी बता सकते थे।
तब गाँधी जी ने कहा, लेकिन तब मैं भी मीठा खाता था।
कुछ राजनीतिक मजबूरियों के बावजूद गाँधी की यह बङी खासियत थी कि उनकी कथनी और करनी में न के बराबर अंतर था।

प्रेरक प्रसंग 8:- सार्वजनिक संघर्ष करो, किन्तु व्यक्तिगत प्रेम रखो।
महात्मा गांधी जी ने भारत में अपने जीवन का सबसे पहला आंदोलन चंपारण में किया।उन्होंने पहले पटना और फिर मुजफ्फरपुर में रहते हुए चंपारण के आला अंग्रेज अफसरों को अनेक पत्र लिखे। उनके सामने आंदोलन की अपनी बात रखी, लेकिन साथ ही उनसे कुशल क्षेप भी पूछा, परिवार के बारे में पूछा, शुभकामनाएं दी।
असर यह हुआ कि जब गाँधी जी चंपारण पहुँचे, तो अंग्रेज अफसर विचलित थे और गांधी जी को गिरफ्तार करने से बच रहे थे।
अत्याचार करने वाले अंग्रेजो के साथ भी गाँधी जी का अच्छा व्यक्तिगत व्यवहार रखते थे।
प्रेरक प्रसंग 9:- जातिगत भेदभाव छोडो़, मिलकर रहो।
गाँधी जी जब नील की जबरन खेती के खिलाफ आंदोलन के लिए चंपारण पहुँचे, तब उनके साथ 12 से ज्यादा रईस वकील साथी थे। सबके पास रसोइये थे, अनेक चूल्हे जलते थे।
गाँधी जी ने एक दिन सारे रसोइयों को छुट्टी दे दी। और वकील मित्रों से कहा:- हम साथ मिलकर एक रसोई का खाना नही खा सकते , तो मिलकर आंदोलन कैसे करेंगे। जिसको वापस जाना है, जा सकता है, भोजन एक जगह बनेगा, सब मिलकर बनाएगें। जाहिर है, भोजन एक जगह बनने लगा और वहां मौजूद वकीलों की जिंदगी हमेशा के लिए बदल गई।

प्रेरक प्रसंग 10:- अच्छी बात के लिए अड़ जाओ, तभी बदलाव आएगा।
अंग्रेजो ने जब हिन्दू समाज में जातिगत विभाजन को पुख्ता संस्थागत बनाने के लिए आरक्षित वर्ग को दो वोट देने का अधिकार देने का प्रावधान किया, तब गाँधी जी अड़ गए और यरवडा जेल में आमरण अनशन शुरू कर दिया। डॉक्टर भीमराव अंबेडकर को समझौते के लिए विवश होना पडा़। पूना समझौता हुआ और आरक्षित वर्ग को यथोचित संयुक्त मताधिकार मिला, जो आज भी चल रहा है।
गाँधी जी अपने लक्ष्य के मामले में बहुत हठी थे, उन्होंने अनेक बार हठ का उपयोग समाज, देश को एकजुट रखने के लिए किया।

प्रेरक प्रसंग 11:- सत्य और ईश्वर पर विश्वास रखो, वह जरूर मदद करेगा।
गाँधी जी ने साबरमती आश्रम में एक दलित परिवार को आश्रय दे दिया था, तो समाज के दानदाता नाराज थे।
गाँधी जी बहुत चिंतित थे कि पैसा कहां से आएगा और क्या आश्रम बन्द करना पडेगा।
तभी आश्रम के गेट पर एक कर रुकी, जिसमे बैठे सेठ ने गांधी जी को बुलवाया और कहा:- मैं आपको कुछ धन देना चाहता हूं, क्या आप लेंगे?
जरूरतमंद गांधी ने हामी भरी।

सेठ ने 13 हजार रुपये दे गए । नाम पूछने का मौका भी नहीं दिया।

इसलिए ईश्वर पर विश्वास रखो वो जरूर मदद करेगा।

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